Friday, December 27, 2019

रामपुर हिंसाः क्या पुलिस मुसलमानों को निशाना बना रही है?

उत्तर प्रदेश के रामपुर में प्रशासन ने बीते शुक्रवार को हुई हिंसा के दौरान सार्वजनिक संपत्ति को हुए नुक़सान की भरपाई के लिए हिंसा में शामिल संदिग्ध लोगों को वसूली के नोटिस भेजे हैं.
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पुलिस ने शहर के चौराहों पर हिंसा में शामिल लोगों के पोस्टर भी लगाए हैं. यूपी के कई अन्य शहरों में भी पुलिस ऐसी ही कार्रवाई कर रही है.
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पुलिस के वाहनों को हुए नुक़सान के अलावा पुलिस के हेलमेट और टूटे हुए डंडों को भी नुक़सान माना गया है इसकी भरपाई के लिए नोटिस भेजे गए हैं. जिन लोगों को नोटिस भेजे गए हैं उनमें मज़दूर भी शामिल हैं.
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रामपुर के ज़िलाधिकारी आंजनेय कुमार सिंह ने बीबीसी से कहा कि अभी तक 28 लोगों को रिकवरी के नोटिस भेजे गए हैं और ये संख्या बढ़ भी सकती है.उन्होंने कहा, "पुलिस ने वीडियो और तस्वीरों के ज़रिए ऐसे लोगों की पहचान की है जिन्होंने 21 दिसंबर को सार्वजनिक संपत्ति को नुक़सान पहुंचाया है. पुलिस ने सार्वजनिक संपत्ति को हुए नुक़सान का आकलन भी किया है. वीडियो और तस्वीरों में दिखे 28 लोगों की नोटिस भेजी गई है, बाक़ी की पहचान की जा रही है."ज़िलाधिकारी ने कहा, "जिन लोगों को नोटिस भेजा गया है उन्हें जवाब का मौक़ा दिया जाएगा और उसके बाद रिकवरी की कार्रवाई की जाएगी."
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उन्होंने बताया कि अभी तक 20-25 लाख रुपए की रिकवरी के नोटिस भेजे गए हैं. जांच पूरी होने के बाद संदिग्धों से रिकवरी की जाएगी. हालांकि भेजे गए क़ानूनी नोटिस में कुल नुक़सान 1486500 रुपए बताया गया है. ज़िलाधिकारी ने अभी ये नहीं बताया है कि ये वसूली कैसे की जाएगी.
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बीते शुक्रवार को देशभर में नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ प्रदर्शन हुए थे. इस दौरान यूपी के कई ज़िलों में हिंसा भड़की थी. रामपुर में शनिवार को प्रदर्शन का आयोजन किया गया था जिस दौरान कई जगह आगजनी की घटनाएं हुईं थीं.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

स्थानीय पत्रकारों ने जब ज़िलाधिकारी से पूछा कि क्या कुछ राजनीतिक दलों से जुड़े लोग भी संदिग्धों में शामिल है?मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

इस प्रश्न के जवाब में ज़िलाधिकारी आंजनेय कुमार सिंह ने कहा, "पुलिस अभी भी वीडियो और तस्वीरें देख रही है, अन्य लोगों की पहचान की जा रही है, संदिग्ध में कई लोग एक राजनीतिक दल से भी जुड़े हैं, अभी पहचान की प्रक्रिया जारी है. प्रशासन जो भी कार्रवाई करेगा, पूरे सबूतों के साथ करेगा, अभी हमारी जांच चल रही है, अगर कुछ राजनीतिक लोग भी सामने आए तो उन पर भी कार्रवाई की जाएगी."
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रामपुर में हुई हिंसा में एक व्यक्ति की गोली लगने से मौत भी हुई है. हालांकि ज़िलाधिकारी ने कहा है कि पुलिस की ओर से कोई गोली नहीं चलाई गई है. उन्होंने कहा, "पूरे घटनाक्रम के दौरान पुलिस की ओर से कोई गोली नहीं चलाई गई है. जिसकी मौत हुई है उसकी हत्या का मुक़दमा दर्ज कर लिया गया है और जांच की जा रही है."वहीं रामपुर पुलिस ने शुक्रवार को हुई हिंसा में शामिल लोगों की तस्वीरें भी जारी की हैं. रामपुर के पुलिस अधीक्षक अजय पाल सिंह ने कहा, "मौके पर पुलिस की ओर से वीडियोग्राफ़ी की गई थी, हमें कुछ तस्वीरें जनता और सीसीटीवी के ज़रिए भी मिली है. ये तस्वीरें हमने जारी की हैं और उपद्रवियों की पहचान के लिए जनता का सहयोग मांगा है. दर्ज मुक़दमों में इनकी गिरफ़्तारी की भी तैयारी की जा रही है."
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नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ हुए प्रदर्शनों के दौरान हुई हिंसा पर प्रतिक्रिया देते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सिंह ने कहा था कि उपद्रवियों से बदला लिमुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रहया जाएगा.

यूपी के कई ज़िलों में हिंसा हुई है जिसमें कम से कम 16 लोगों के मारे जाने की पुष्टि हुई है. ऐसे कई वीडियो आए हैं जिनमें यूपी पुलिस प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाती दिख रही है, हालाँकि यूपी पुलिस ने कहा है कि पुलिस की ओर से कोई गोली नहीं चलाई गई है.बुधवार को रामपुर में प्रशासन ने हिंसा में शामिल संदिग्ध लोगों के घरों पर नोटिस भिजवाए. ऐसा ही एक नोटिस थाना गंज क्षेत्र के नई बस्ती इलाक़े में रहने वाले पप्पू के घर भी भेजा गया है. पप्पू फ़िलहाल हिंसा के आरोप में जेल में है.पप्पू के भाई नदीम ने बीबीसी को बताया कि उनके भाई न तो प्रदर्शन में शामिल थे ना किसी तरह की हिंसा में.उन्होंने कहा, "मेरा भाई अपने घर में सो रहा था जब पुलिस आई और उसे बिस्तर से खींचकर ले गई. हमें तो ये भी नहीं पता कि उन्हें गिरफ़्तार क्यों किया गया है."
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पाँच बच्चों के पिता पप्पू पेशे से मज़दूर हैं और डेटिंग-पेटिंग का काम करते हैं. नदीम बताते हैं कि उनके इलाक़े की मस्जिद से ये ऐलान किया गया था कि कोई भी प्रदर्शन में न जाए इसलिए उनके घर से कोई इसमें शामिल नहीं हुआ. वो कहते हैं, "पुलिस के पास पावर है, वो जो चाहे कर सकती है, ग़रीब आदमी दबता ही है, हमारे पास तो वकील करने के भी पैसे नहीं है. हमारे साथ ज़ुल्म हो रहा है, हमें नहीं पता कि आगे क्या करना है."नदीम कहते हैं, "सुबह पुलिस आई, घर का दरवाज़ा तोड़ा और मेरे भाई को उठाकर ले गई. उनका घर गली के शुरू में ही है, हमें लगता है कि पुलिस को जो हाथ लग रहा है उसे उठा रही है, भले ही वो बेगुनाह ही क्यों न हो."रामपुर के गंज थानाक्षेत्र के ही रहने वाले इस्लाम के नाम भीमुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह पुलिस ने वसूली का नोटिस जारी किया है.

36 साल के इस्लाम भैंसे ख़रीदने-बेचने का काम करते हैं. उनके भाई आशू का आरोप है कि शनिवार सुबह के वक़्त वो घर के बाहर कुछ लोगों के साथ आग ताप रहे थे जब पुलिस उन्हें उठा कर ले गई.आशू कहते हैं, "पुलिस ने आग ताप रहे छह लोगों को पकड़ा, सबके नाम पूछे, तीन हिंदू थे उन्हें छोड़ दिया, जो मुसलमान थे उन्हें थाने ले गए. हमें बताया भी नहीं गया कि हमारे भाई को क्यों गिरफ्तार कर ले."आशू कहते हैं, "हम अपने भाई से मिलने थाने गए, हमें मिलने भी नहीं दिया गया. हमारे पास पैसे भी नहीं है जो पुलिस को देकर अपने भाई को छुड़ा लें."वो कहते हैं, "शहर में बलवा हुआ, पुलिस अब जिसे चाहे उठा रही है, मेरे भाई के ख़िलाफ़ कोई सबूत है तो उसे दिखाया जाए. अगर मेरा भाई दंगे में शामिल है तो उसे जेल में सड़ा दो और अगर वो बेगुनाह है तो उसे छोड़ों. पुलिस बस हमें परेशान कर रही है."बुधवार शाम को नोटिस लेकर आए पुलिसकर्मी ने इस्लाम के परिवार से कहा, "इस्लाम ने जो तोड़फोड़ की है, उसका जुर्माना लगा है, अब जुर्माना जमा करना होगा."
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हालाँकि इस्लाम के परिवार ने नोटिस लेने से इनकार कर दिया. इस्लाम की पत्नी की जुलेख़ा ने बीबीसी से कहा, "मेरे पति भैंस का दूध दूहकर बाहर गए थे कि पुलिस उठा ले गई. अब पुलिस नोटिस लेकर आई है, डरा धमका रहे हैं, कह रहे हैं कि पैसे दो, हम किस बात के पैसे दें? मेरे छोटे-छोटे बच्चे हैं, अब इनका क्या करूं, इन्हें कहां से खाना खिलाऊं? हमारे पास बच्चों को खिलाने के लिए खाना नहीं है, हम जुर्माना कहां से भरें, किस बात का भरें?"इस्लाम जिस घर में रहते हैं, उसी में भैंसे भी पालते हैं जिनका दूध बेचकर वो अपना परिवार चलाते हैं. अब उनके जेल जाने के बाद परिवार के सामने दो वक़्त की रोटी का संकट खड़ा हो गया है.रामपुर के सामाजिक कार्यकर्ता फ़ैसल लाला कहते हैं, "पप्पू नाम के जिस व्यक्ति को रिकवरी का नोटिस दिया गया है मैं उसे जानता हूं. वो एक मज़दूर आदमी है. प्रशासन सिर्फ़ ग़रीब मुसलमानों को निशाना बना रहा है."फ़ैसल लाला कहते हैं, "प्रशासन को ये भी बताना चाहिए कि इससे पहले जहां-जहां इस तरह के उपद्रव हुए हैं वहाँ किन-किन को रिकवरी के नोटिस जारी किए गए हैं. जब मुज़फ़्फ़रनगर में दंगे हुए थे तब भी क्या दंगाइयों से रिकवरी की गई थी?"वहीं ज़िला प्रशासन का कहना है कि नोटिस उन ही लोगों को भेजे जा रहे हैं जिन्हें वीडियो और तस्वीरों के आधार पर चिन्हित किया गया है.ज़िलाधिकारी आंजनेय कुमार सिंह कहते हैं, "अभियुक्त और उनके परिजन बेगुनाह होने के सबूत पेश कर सकते हैं. पूरी जाँच के बाद ही रिकवरी की जाएगी."मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

Monday, December 9, 2019

झारखंड चुनाव: मुसलमान 15 फ़ीसदी फिर भी इतने उपेक्षित क्यों

झारखंड में पहला विधानसभा चुनाव 2005 में हुआ. इस विधानसभा चुनाव में केवल दो मुसलमान विधायक बने. दूसरा विधानसभा चुनाव 2009 में हुआ और इसमें सबसे ज़्यादा पाँच मुसलमान विधायक चुने गए.

2009 में झारखंड का विधानसभा चुनाव बहुकोणीय हुआ था और इसका फ़ायदा मुस्लिम प्रत्याशियों को मिला था. इन पाँच में से दो कांग्रेस, दो झारखंड मुक्ति मोर्चा और एक बाबूलाल मरांडी की पार्टी झारखंड विकास मोर्चा (प्रजातांत्रिक) के थे.

2014 के विधानसभा चुनाव में एक बार फिर से मुसलमानों का प्रतिनिधित्व दो सीटों पर सिमट कर रह गया. आलमगीर आलम और इरफ़ान अंसारी कांग्रेस के टिकट से जीते थे.

2011 की जनगणना के अनुसार झारखंड में मुसलमानों की आबादी 15 फ़ीसदी है लेकिन विधानसभा में इनका प्रतिनिधित्व न के बराबर रहता है.

संथाल परगना के देवघर, गोड्डा, जामताड़ा, साहेबगंज और पाकुड़ के अलावा लोहरदगा और गिरिडीह में मुसलमानों की आबादी सबसे ज़्यादा है. साहेबगंज और पाकुड़ में मुसलमान कुल आबादी के 30 फ़ीसदी हैं जबकि देवघर, गोड्डा, जामताड़ा, लोहरदगा और गिरिडीह ज़िले में मुसलमानों की आबादी 20 फ़ीसदी है.

राँची में क़रीब 20 फ़ीसदी मुसलमान हैं. गोड्डा एकमात्र लोकसभा सीट है जहां से झारखंड बनने के बाद कोई मुसलमान सांसद बना. 2004 में यहाँ से कांग्रेस के टिकट पर फुरक़ान अंसारी जीते थे. इसके बाद से कोई मुसलमान झारखंड से लोकसभा सांसद नहीं बना.

फुरक़ान अंसारी अविभाजित बिहार में विधायक भी रहे हैं. वो कहते हैं कि जब तक राजनीतिक पार्टियाँ टिकट नहीं देंगी तब तक मुसलमानों का प्रतिनिधित्व नहीं बढ़ेगा.

बीजेपी ने झारखंड में आज तक किसी मुस्लिम प्रत्याशी को टिकट नहीं दिया. झारखंड के मुख्यमंत्री रघुबर दास से जब ये पूछा गया कि प्रदेश में 15 फ़ीसदी मुसलमान हैं और आपकी पार्टी ने किसी भी मुसलमान को झारखंड बनने के बाद से न लोकसभा में और न ही विधानसभा में टिकट नहीं दिया, क्या आप इससे असहज नहीं होते हैं?

उनका जवाब था, "बिल्कुल नहीं. बीजेपी किसी को भी धर्म और जाति के आधार पर टिकट नहीं देती है. बीजेपी उस उम्मीदवार को टिकट देती है जिसमें जीतने की क्षमता होती है."

हालाँकि रघुबर दास को बीजेपी ने जब पहली बार 1995 में जमशेदपुर पूर्वी से उम्मीदवार बनाया था तो उनकी जीतने की क्षमता का अंदाज़ा किसी को नहीं था. बीजेपी के दिग्गज नेता दीनानाथ पांडे को हटाकर रघुबर दास को टिकट मिला था और वो हारते-हारते जीते थे और उसके बाद से रघुबर दास लगातार जीतते रहे.

झारखंड में बीजेपी के लिए किसी व्यक्ति के जीतने की क्षमता से ज़्यादा पार्टी में जीतने की क्षमता होती है. रघुबर दास ने भी बीबीसी से बातचीत में कहा कि वो बीजेपी से अलग होने पर विधायक का चुनाव भी नहीं जीत पाएँगे. ऐसे में किसी मुसलमान को टिकट इस तर्क के आधार पर नहीं देना कि उसमें जीतने की क्षमता नहीं है गले से नहीं उतरता.

रघुबर दास ने ये भी कहा कि उनकी पार्टी ने इस बार तीन ईसाई आदिवासियों को टिकट दिया है. अगर बीजेपी धर्म के आधार पर टिकट नहीं देती है तो इसे उन्होंने अलग से रेखांकित करना ज़रूरी क्यों समझा?

प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता आलोक दुबे का कहना है कि इस बार 31 सीटों पर ही कांग्रेस चुनाव लड़ रही है और इसमें भी कई सीटें आदिवासियों के लिए रिजर्व हैं ऐसे में तीन से ज्यादा गुंजाइश नहीं थी.

उन्होंने कहा कि 2014 में उनकी पार्टी ने छह मुसलमान प्रत्याशी उतारे थे लेकिन दो ही जीत पाए थे. लेकिन वे इस बात से सहमत हूँ कि मुसलमानों का प्रतिनिधित्व बढ़ना चाहिए.

जेएमएम प्रवक्ता सुप्रियो भट्टाचार्य का कहना है कि उनकी पार्टी मुसलमानों को जितना टिकट देती है वो संतोषजनक है.

उन्होंने कहा कि पार्टी को हर सेक्शन को देखना होता है. भट्टाचार्य ने कहा कि पिछले बार पार्टी ने चार टिकट दिए लेकिन कोई मुस्लिम प्रत्याशी नहीं जीत पाया.

राँची यूनिवर्सिटी में उर्दू भाषा और साहित्य के प्रोफ़ेसर रिज़वान अली कहते हैं, "इसे समझने के लिए आपको 1950 में राष्ट्रपति के अध्यादेश को देखना पड़ेगा. तब इस अध्यादेश के तहत संविधान के अनुच्छेद 340 में अनुसूचित जनजाति और अनुच्छेद 341 में अनुसूचित जाति को पारिभाषित किया गया."

"अनुच्छेद 340 और 341 के क्लॉज़ तीन और चार में जोड़ गया कि सिख, बौद्ध और जैन भी एससी और एसटी हो सकते हैं. लेकिन मुसलमानों और ईसाइयों को इससे बाहर रखा गया. लेकिन झारखंड में आदिवासी ईसाई परंपरागत रूप से एसटी सीट पर अब भी चुनाव लड़ते हैं. हालाँकि इस पर भी अब बहस तेज़ हो गई है और संभव है कि आने वाले दिनों में ईसाई धर्म अपनाने वाले आदिवासियों को आरक्षण के अधिकार से बाहर करने की बात ज़ोर पकड़े."

झारखंड में मुसलमानों के प्रतिनिधित्व को लेकर प्रोफ़ेसर रिज़वान कहते हैं, "झारखंड में नगर निगम के स्तर पर मुसलमानों का प्रतिनिधित्व बढ़िया है. राँची नगर निगम में 52 सीटें हैं जिनमें से 12 मुसलमान हैं. ऐसा इसलिए है कि नगर निगम का चुनाव पार्टियों के टिकट पर नहीं लड़ा जाता है. अगर पार्टियों के टिकट पर लड़ा जाता तो यहाँ भी वही स्थिति होती."

"दरअसल, झारखंड में पार्टियों के भीतर उस तरह की संवेदनशीलता नहीं है जबकि बिहार में है. जब झारखंड नहीं बना था तो मुसलमानों का प्रतिनिधित्व ज़्यादा था. बिहार में पंचायत, ज़िला परिषद और बोर्ड निगमों में भी मुसलमान पर्याप्त हैं."

"बिहार में मुसलमानों के राजनीतिक उत्थान में पंचायती राज की अहम भूमिका रही है. वहीं झारखंड में ऐसा नहीं हो पाया. झारखंड में आदिवासियों सीटें बड़ी संख्या में रिज़र्व हैं. जहां आदिवासियों की आबादी 40 फ़ीसदी भी नहीं है वहाँ भी पंचायतों में उनके लिए सीटें रिज़र्व हैं."

Tuesday, December 3, 2019

तो क्या अब ख़त्म हो जाएगा अनलिमिटेड कॉल का दौर?

भारत के टेलीकॉम बाज़ार में तीन-चार साल पहले तक लगभग 10 कंपनियां मौजूद थीं. इनके बीच अच्छी प्रतिद्वंद्विता थी जिसके चलते सस्ते टैरिफ़ प्लान ग्राहकों को मिलते थे, उन्हें कई आकर्षक ऑफ़र चुनने को मिल जाते थे.

लेकिन जब रिलायंस जैसे बड़ी कंपनी ने जियो को बाज़ार में उतारा तो उन्होंने बहुत आक्रामक तरीक़े से अपना प्रचार किया. उन्होंने बाकी सभी कंपनियों के मुक़ाबले अपने प्लान को सबसे ज़्यादा सस्ता रखा. लोग उनकी ओर आकर्षित होते चले गए और बाकी कंपनियों का साथ छूटता चला गया.

इन तीन चार साल में जियो के ग्राहकों की संख्या लगातार बढ़ती गई जबकि बाज़ार में मौजूद बाकी टेलीकॉम कंपनियां ग़ायब होती चली गईं और अब सिर्फ़ चार कंपनियां ही हमारे सामने रह गई हैं.

इन चार में से भी एक कंपनी बीएसएनएल है, जिसका हाल किसी से छिपा नहीं है. वह बाज़ार में है भी या नहीं कुछ कहा नहीं जा सकता. तो मोटे तौर पर जियो के अलावा सिर्फ़ दो ही प्रमुख कंपनियां हैं, एयरटेल और वोडाफ़ोन. बाज़ार का यह हाल चिंताजनक है.

दूरसंचार उद्योग की स्थिति पर आशंकाओं को और बढ़ाते हुए भारत की सबसे बड़ी टेलीकॉम कंपनियों में शामिल वोडाफ़ोन-इंडिया को दूसरी तिमाही में रिकॉर्ड 74,000 करोड़ रुपये का घाटा हुआ है.

एक अरब से अधिक मोबाइल ग्राहकों के साथ भारत दुनिया के सबसे बड़े दूरसंचार बाज़ारों में से एक है. इसके बावजूद कंपनी को जो नुकसान हो रहा है वो वाकई चिंता का विषय है. ऐसे में कंपनियों ने कुछ क़दम उठाए हैं.

एयरटेल और वोडाफ़ोन को अपने टैरिफ़ प्लान के रेट बढ़ाना बहुत ज़्यादा ज़रूरी हो गया था. जैसे हालात उनके सामने बने हुए हैं, उनके स्पैक्ट्रम के ख़र्चे लगातार बढ़ रहे हैं.

इस वजह से इन कंपनियों को हर तिमाही में नुकसान उठाना पड़ रहा है. अगर ये कंपनियां अपने टैरिफ़ प्लान में बदलाव किए बिना ही आगे बढ़ती जातीं तो इनका बाज़ार में बने रह पाना ही नामुमकिन सा हो जाता और तब सिर्फ़ जियो अकेला बाज़ार में रह जाता.

अगर इस तरह के हालात के बारे में सोचें तो इन टैरिफ़ प्लान में हुए बदलाव को अच्छा ही माना जाना चाहिए. क्योंकि बाज़ार में प्रतिस्पर्धा लगातार कम होती जा रही है. ऐसे में इन कंपनियों को मिलकर ही फ़ैसला करना था.

जियो के पीछे एक बहुत बड़ी कंपनी का हाथ था. उसके पास पैसे की कोई कमी नहीं थी. यही वजह है कि उसने ग्राहकों को अपनी तरफ़ खींचने के लिए लुभावने ऑफ़र उपलब्ध करवाए.

भारत में टेलीकॉम का व्यापार बहुत महंगा माना जाता है. इसमें स्पैक्ट्रम का ख़र्च, स्पैक्ट्रम को इस्तेमाल करने का अलग ख़र्च, नेटवर्क स्थापित करने का ख़र्च शामिल होता है.

इससे भी बड़ी बात यह है कि भारत में प्रति यूज़र जो औसत आय है वह बहुत कम है. इसका मतलब है कि भारत में लोग मोबाइल पर बहुत कम ख़र्च करना चाहते हैं.

भारत में एक आम आदमी का औसतन महीने का मोबाइल बिल 100-150 रुपए तक आता है. यह दुनिया में सबसे कम ख़र्च है. इतने कम ख़र्च में किसी तरह की टेलीकॉम कंपनी का चलना बहुत ही मुश्किल है.

Thursday, November 21, 2019

कश्मीर पर अमित शाह के 'स्थिति सामान्य हो चुकी है' दावे का सच

गृह मंत्री अमित शाह ने 20 नवंबर को राज्य सभा में दावा किया है कि भारत प्रशासित कश्मीर में स्थिति पूरी तरह सामान्य हो चुकी है.

ये पहला मौका था जब अमित शाह जम्मू-कश्मीर राज्य का विशेष दर्जा ख़त्म होने के बाद आधिकारिक रूप से राज्य सभा में कश्मीर के हालातों पर अपना बयान दे रहे थे.

बीते कई सालों से जम्मू और कश्मीर से रिपोर्टिंग कर रहे बीबीसी संवाददाता रियाज़ मसरूर ने इन दावों की सच्चाई जानने की कोशिश की है.

अमित शाह ने दावा किया है कि "वहां पर स्थिति सामान्य ही है. इसके बारे में कई भ्रांतियां फैली हुई हैं. मैं पूरी स्थिति के सामान्य होने के बारे में बताना चाहता हूं."

पाँच अगस्त के बाद से अस्पताल से लेकर स्कूल और अशांति पर रिपोर्ट करने के बाद रियाज़ बताते हैं कि पिछले दिनों बर्फ़बारी के बाद से घाटी में स्थितियां सामान्य होती दिख रही थीं.

रियाज़ मसरूर अमित शाह के भाषण के दौरान श्रीनगर के लाल चौक पर मौजूद थे.

कश्मीरी लोगों पर इस भाषण के असर को बताते हुए रियाज़ कहते हैं, "बीते दिनों से यहां पर अनाधिकारिक हड़ताल चल रही थी. दुकानें 11 बजे तक खुलती थीं और इसके बाद दुकानें बंद हो जाती थीं.

"लेकिन बर्फ़बारी होने के बाद से घाटी में हालात धीरे-धीरे सामान्य होने लगे थे. लोग दुकानें खोल रहे थे."

"लेकिन अमित शाह के भाषण के एक घंटे बाद ही लाल चौक पर दुकानें बंद हो गई. इसके साथ ही डाउन टाउन श्रीनगर में भी दुकानें बंद हो गईं और कुछ लड़कों ने दुकानों पर पत्थरबाज़ी भी की."

अमित शाह ने दावा किया है, "195 पुलिस स्टेशन से सीआरपीसी 144 हटा ली गयी है और पत्थरबाज़ी की घटनाओं में कमी आई है."

रियाज़ मसरूर बताते हैं, "ये बात बिलकुल दुरुस्त है. कश्मीर में अब उतनी पत्थरबाज़ी नहीं होती जितनी पहले ऐसी परिस्थितियों में होती थी."

"स्थानीय लोग बताते हैं कि इसके लिए 5 अगस्त के बाद से साढ़े छह हज़ार लोगों की कि गई गिरफ़्तारी ज़िम्मेदार है. हालांकि, इनमें से पांच हज़ार लोगों को छोड़ दिया गया है."

"यहां पर पथराव की घटना सिर्फ़ एक बार देखी गई है जब यहां पर यूरोपीय संघ का प्रतिनिधि मंडल आया था. इस एक दिन में साठ ऐसी घटनाएं घटी थीं."